फ़्यूचर्स और ऑप्शन्स के बीच अंतर

19 April 2022
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फ़्यूचर्स और ऑप्शन्स के बीच अंतर
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फ्यूचर और ऑप्शन्स के बीच अंतर जानने से पहले यह जान लेना आवश्यक है की फ्यूचर एंड ऑप्शंस क्या हैं। 

फ़्यूचर्स और ऑप्शंस बायर और सेलर  के बीच, भविष्य में, पहले से तय मूल्य पर, स्टॉक एसेट के व्यापार के लिए साइंड कॉन्ट्रैक्ट्स होते हैं। इस तरह के कॉन्ट्रैक्ट्स, पहले से ही तय मूल्य को लॉक करके, स्टॉक मार्केट ट्रेडिंग में शामिल बाजार रिस्क्स को हेज करने की कोशिश करते हैं।

शेयर बाजार में फ़्यूचर्स और ऑप्शंस ऐसे कॉन्ट्रैक्ट्स हैं जो एक अंडरलाइंग एसेट से अपनी कीमत प्राप्त (डीराइव) करते हैं, जैसे शेयर, स्टॉक मार्केट इंडेक्स, कमोडिटी, ईटीएफ, और बहुत कुछ ।

डीराइवड वैल्यू क्या है ? सरल भाषा में बोला जाये तो किसी एसेट के वज़ह से मिलने वाला कीमत को डीराइवड वैल्यू कहा जा सकता है।  

फ़्यूचर्स और ऑप्शंस – इनके बीच में क्या अंतर हैं ?

फ्यूचर एंड ऑप्शंस के बीच अंतर, दायित्वों (ओब्लिगेशंस), रिस्क, एडवांस पेमेंट और कॉन्ट्रैक्ट एक्सेक्यूशन कब किया जा सकता है, इन सब पर केंद्रित है ।  

  • दायित्वों (ओब्लिगेशंस)

फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट दो पक्षों के बीच भविष्य में एक निश्चित समय पर एक निश्चित कीमत पर संपत्ति खरीदने या बेचने का एक समझौता है। यहां, खरीदार पहले से तय की गयी भविष्य की तारीख पर संपत्ति खरीदने के लिए बाध्य (ओबलाईज) है।

एक ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट खरीदार को एक निश्चित कीमत पर संपत्ति खरीदने का अधिकार देता है। हालांकि, खरीदने के लिए खरीदार की ओर से कोई दायित्व (ऑब्लिगेशन) नहीं है। मगर फिर भी, अगर खरीदार संपत्ति खरीदना चाहे, तो विक्रेता इसे बेचने के लिए बाध्य है।

  • जोखिम (रिस्क)

फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट होल्डर भविष्य की तारीख में खरीदने के लिए बाध्य है, भले ही उनके लिए ये घाटे का सौदा हो। मान लीजिए कि एसेट का बाजार मूल्य कॉन्ट्रैक्ट में लिखा मूल्य से नीचे आता है। खरीदार को फिर भी इसे पहले से एग्रीड कीमत पर खरीदना होगा और नुकसान उठाना होगा।

एक ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट में खरीदार को यहां एक फायदा है। यदि एसेट वैल्यू सहमत (अग्रीड) मूल्य से कम हो जाता है, तो खरीदार इसे खरीदने से मना कर सकता है। यह खरीदार के नुकसान को सीमित या कम करता है।

दूसरे शब्दों में, एक फ्यूचरस कॉन्ट्रैक्ट अनलिमिटेड लाभ या हानि ला सकता है। इस बीच, एक ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट अनलिमिटेड लाभ ला सकता है, लेकिन यह संभावित (पोटेंशियल) नुकसान को कम करता है।

  • एडवांस पेमेंट:

फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट में प्रवेश करते समय कोई एडवांस पेमेंट नहीं देना होता है। लेकिन खरीदार असेस्ट्स के लिए सहमत कीमत एग्रीड प्राइस देने के लिए बाध्य है।

एक ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट में खरीदार को प्रीमियम अमाउंट खरीदना पड़ता है। इस प्रीमियम अमाउंट का पेमेंट ऑप्शंस खरीदार को भविष्य की तारीख में संपत्ति को कम आकर्षक होने पर नहीं खरीदने का विशेषाधिकार देता है। यदि ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट होल्डर संपत्ति को नहीं खरीदना चाहता है, तो उसे, पे किये गए प्रीमियम अमाउंट का नुकसान होता है।  

दोनों ही मामलों में, आपको कुछ कमीशन पे करना पड़ सकता है।

  • कॉन्ट्रैक्ट एक्सीक्यूशन:

एक फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट, कॉन्ट्रैक्ट में दिए गए अग्रीड डेट पर एक्सेक्यूट किया जाता है। इस डेट पर, खरीदार अंडरलाइंग एसेट खरीदता है।

हालांकि, एक ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट में खरीदार एक्सपायरी डेट से पहले कॉन्ट्रैक्ट एक्सेक्यूटे कर सकता है। और जब भी उसे लगता है कि परिस्थितियां सही हैं, तो वह संपत्ति खरीद सकता हैं।

संक्षेप में:

फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट में:

  1. खरीदार कॉन्ट्रैक्ट का सम्मान करने के लिए बाध्य है।  
  2. यदि खरीदार अपना अधिकार प्रयोग करता है तो कॉन्ट्रैक्ट के अनुसार  विक्रेता (सेलर) को बेचने/खरीदने का दायित्व पालन करना ज़रूरी है।
  3. ऑप्शंस की तुलना में अधिक मार्जिन पेमेंट की आवश्यकता होती है।
  4. असीमित लाभ हानि की सम्भावना रहती है।  

ऑप्शंस में:

  1. खरीदार पर वास्तव में खरीदने या बेचने का कोई दायित्व नहीं है।
  2. यदि खरीदार अधिकार प्रयोग करता है तो कॉन्ट्रैक्ट में सेलर को बेचने/खरीदने का दायित्व पालन करना है।
  3. फ्यूचर्स की तुलना में कम मार्जिन पे करने की आवश्यकता है।
  4. हेजर्स (Hedgers) द्वारा पसंद किया गया जाता है ।
  5. असीमित (अनलिमिटेड) लाभ सीमित (लिमिटेड) हानि की सम्भावना रहती है।  
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